बुधवार, 4 अगस्त 2010

एनेलिटिक इमोशन

बयासी रुपये का आर्चीज़ का ग्रीटिंग कार्ड. जो मेरी खुद की दुकान होने की वजह से मुझे लागत मूल्य में पड़ा था. १२ रुपये का नगद फायदा.
३ महीने बीत गए, अभी कल की ही तो बात लगती है जब मैं तुमसे  मिला था.

मुझे लगता है, तुम्हें सोचते सोचते पूरी ज़िन्दगी बिता सकता हूँ. या  कम   से कम  इतना  समय जब तक कि  तुमसे खूबसूरत  कोई  और नहीं  मिल  जाये. फ़िर  अभी तो दस ही बजे हैं यानि बस ३ घंटे हुए है दुकान खोले. 
शायद  समय बड़ी  तेज़ रफ़्तार  चल रहा था.

xxx

"मुझे अंग्रेजी में पढने वाले बच्चों का सामान चाहिए. आपकी दुकान में मिल जाएगा भाई सा'ब ?"
उसने अपने बच्चे की ऊँगली पकड़ी हुई थी. ये कहते हुए उसने अपने ४-५ साल के बेटे को देखा. उसकी अंग्रेजी वाली  गर्वानुभूती देखने के लिए मुझे कोई मनोवैज्ञानिक  होने की ज़रूरत नहीं थी. बच्चे की आँखों का रंग बाप के चेहरे में था और बाप के चेहरे का गर्व उत्साह बन के बच्चे की आँखों को किसी बच्चे की आँखों सा ही चमकदार बनाता था.
"और पापा..." बच्चे ने अपने पापा को देखने के लिए गर्दन ऊपर उठाई. "...रंग भी."
पापा  ने कुछ नहीं बोला. बोल भी नहीं सकता. नशे में आदमी या तो चिल्लाना पसंद करता है या गुमसुम हो जाता है.
... आखिर उसका बच्चा अंग्रेजी  में पढने जा रहा था.
...सच उसका बच्चा अंग्रेजी  में पढने जा रहा था.
...देखो मेरा बेटा, अंग्रेजी...
अपने बेटे के बालों को सहला दिया उसने. एक हवा का झोंका जिसमें बच्चे के बालों का उड़ना और नई किताबों की खुश्बू थी. बच्चे ने एक बार आँख झपकी और जब उसकी आँखें दोबारा खुली तो वो चमक बढ़ी हुई सी लगी मुझे. अपने बालों को सही करते हुए वो पापा को देखकर मुस्कुरा दिया था. उँगलियाँ अब भी बंधी हुई थी.
"ये लीजिये भाई सा'ब ६० रुपये हुए." मैंने लगभग जल्दी में सारा हिसाब जोड़ते हुए कहा. दुकान में  भीड़ हो ऐसा नहीं था. बस, मैं फिर बीते हुए समय में खो जाना चाहता था इसलिए. वो समय जिसे बिताने के लिए बयासी (-१२) रुपये खर्च हुए थे मेरे.
ऐसा क्यूँ होता है कि लोग एक ही जेब में अपने सारे पैसे नहीं रखते?
उसकी सारी जेबें जब टटोली जा चुकी थी तब हिसाब हुआ, उसने पैसों को दोबारा गिना,
एक २० का नोट, ३ दस के, ५ रुपये का एक और नोट, और कुछ सिक्के
= ६१ रुपये.
हिसाब बिल्कुल ठीक था.(>१)
पर फिर भी जाने वो अपनी जेब में क्या ढूंढ रहा था?
अब उसके पीछे सामान लेने वालों की भीड़ बढती जा रही थी. छोटी सी दुकान होने की वजह से मेरा कोई नौकर नहीं था. मेरा सपना देखने का सपना ,आज भी  सपना  ही  रह  जाने  वाला  था.
"भाई सा'ब..."
"हं..?"
"...ज़रा ज़ल्दी करिए ना. हो तो गए पैसे."
"मम्म... हाँ... हाँ...."
पीछे वाली जेब में एक पर्स उसमें भी ढेर सारी जेबें. और हर जेब में मुड़े टुडे कागज़, जिनमें से कुछ कोने से काले पड़ गए थे और कुछ ठीक वहां से फटने लग गए थे जहाँ पर  से करीने के फोल्ड करके रखे थे. किसी भी आम हिन्दुस्तानी का पर्स था वो. कुछ बुदबुदाते हुए ४-५ कागज़ पढ़ के उसने वहीँ फैंक दिए. और...
अरे वाह !! एक और नोट...
मेरी किताबों की दुकान होने की वजह से इतना तो बता ही सकता हूँ कि उस २ रुपये के नोट में कम से कम ३ रुपये का सेलोटेप लगा था.
=६३ रुपये.
बच्चे ने पापा की उंगलिया छुड़ाई और जेब से ७  रुपये के सिक्के और निकाले. और फिर पापा कि उँगलियाँ पकड़ ली.
=७० रुपये.
"बाकी की पेंसिलें रबड़ और कटर..."
दिल्ली में पोलीथीन मना है, इसलिए ब्राउन पेपर के बैग में सारा सामान पकड़ा दिया मैंने उसे.
बच्चे ने पापा के हाथ से बैग पकड़ लिया था. और पापा की उंगलिया छुड़ा के बैग अपने दोनों छोटे छोटे हाथों में सीने से भींच लिया. बच्चा  बैग ऊपर से खुला होने की वजह से अन्दर की सारी चीज़ें देख सकता था और इसलिए देख रहा था.
दोनों बहुत खुश थे. (क्या कोई और मनोदशा भी हो सकती है?) और अपने घर जाने को तैयार. उससे पहले एक दूसरे को बड़ी देर तक देखते रहे थे.
देर तक..
शायद समय समय बड़ा धीरे चल रहा था.


xxx

हलवाई मिठाई खाना पसंद नहीं करता. पढने लिखने और हिसाब-किताब से मुझे वितृष्णा सी है. और मैं इसमें जरा कच्चा भी हूँ.
"भाई सा'ब एक मिनट..."
उनके पीछे मुड़ने तक मैं हिसाब तीन बार जोड़ चुका था.
"...बेटा ज़रा बैग देना."
बच्चे ने खुद से बैग छीनते हुए मुझे दिया. सारा सामान फैला के जब मैंने वापिस डालना शुरू किया...
"दस और सात सत्रह, सत्रह और नौ छब्बीस, छब्बीस और....
...भाई सा'ब माफ़ करना पर हिसाब में कुछ गड़बड़ हो गयी लगता है. आपके बयासी  रुपये हुए."
मैं उसके बदलते हुए हाव भाव देख रहा था, एक आदमी एक पल में कितना ज्यादा टूट सकता है. वो चीज़ जो उसे सबसे ज्यादा खुश कर सकती है किसी दूसरे पल में  वही सबसे बड़े दुःख का हेतु होती हैं. वो एहसास जो उसे गर्व करने पे मजबूर करते हैं  वही किसी बदले हुए परिदृश्य में उसकी सबसे ज्यादा बेईज्ज़ती करा सकते हैं, और ये सब इतना ज़ल्दी हो तो?
गुरुत्वाकर्षण बल आपका भार घटा देता है, आप खुद को बहुत हल्क़े लगते हैं और.... और....
...धड़ाम !!

"पापा सुनो न... हम रंग नहीं लेंगे."
"भाई सा'ब ज़ल्दी करिए." मैं जानता था कि उसके पास और पैसे नहीं हैं. बस इस बात का इंतज़ार था कि...
"हांआ ? हाँ... हाँ...."
"भैया हम कल आ सकते हैं?"
ऐसे ग्राहकों को मैं जानता था...
और जानता था कि न 'वो' कल आएगा, न वो 'कल' आएगा.
"ये अंग्रेजी वाली कॉपी रहने दो. हम कल ले जायेंगे. पक्का..."(८२-१२ = ७०)
"......."
"...चल बेटा."
समय अपनी रफ़्तार से चल रहा था. ना तेज़ ना धीरे.

1 टिप्पणी:

  1. एक गहरे उच्छवास के अलावा कुछ नहीं

    इसे आज प्रिंट पर लिया गया है
    देखिए संध्या 6 बजे
    http://blogsinmedia.com पर

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