गुरुवार, 8 जुलाई 2010

योगक्षेमं वहाम्यहम (डायरी)

मुख पृष्ठ :
१९८५
एल. आई. सी.
 योगक्षेमं वहाम्यहम

प्रथम पृष्ठ:
होम एड्रेस :
एस.एस. द्विवेदी
ऍफ़ २ - ११८ , पॉकेट आर
दिलशाद गार्डन
न्यू दिल्ली -९६

ऑफिस एड्रेस:
सी. ई. ओ.-रुचिता गारमेंट्स
५१२ ओखला इंडस्ट्रियल एरिया फेज़ - ३
नियर मोदी मिल
न्यू दिल्ली-२०

दूरभाष : २१४४८ ऑफिस : २२१११


०१.०१.१९८५
दशमी, शुक्ल पक्ष, पौष, मंगलवार
३१ स्ट होने के कारण कल की रात ज़्यादा ही पी ली. हैंगोवर अब तक है. ३-४ दिन पहले ही मेरे एल आई सी एजेंट ने मुझे ये डायरी गिफ्ट की है, आज तक तो कभी नहीं लिखी पर अब सोचता हूँ कि इसको रेगुलरली भरूँगा...
राजेश और उसकी माँ मंदिर गए हैं.
दो बातें समझ से परे हैं...
पहली, यदि ज्योतिष विज्ञान हिन्दू पंचांग पर आधारित है तो इसका प्रभाव किस प्रकार अंग्रेजी कैलंडर के मंगल से शुरू होने पर होगा?
और दूसरी, राजेश की माँ को इतना समझ क्यूँ नहीं आता कि राजेश का उसके साथ मंदिर जाने का कारण ईश्वर को नहीं बल्कि 'उसे' मक्खन लगाना है.
गए आज ५०० रुपये और. मेरे मेनेजर की १० दिन की तनख्वाह...
बहरहाल आज ऑफिस जाने का मन नहीं है. शीला भी, लगता है, कॉलेज चली गयी. वैसे भी उससे एक मोर्निंग टी एक्स्पेक्ट करना बेईमानी ही होगी. देखूं फ्रिज में कुछ ज्यूस - सोडा वगैरा...
उफ्फ्फ ये माईग्रेन !

०२.१.१९८५
ऑफिस आज भी नहीं गया, सर का दर्द और बढ़ गया. सुबह डायरी भी नहीं लिख पाया, चाहता हूँ कि रोज़ कुछ न कुछ लिखूं, नया मुल्ला जो ठहरा...
शीला और राजेश की लड़ाई से नींद  खुल गयी थी. पर मन और सर दोनों भारी रहे, सो लेटा रहा. बांग्लादेश वाली पार्टी से क्न्साइनमेंट फ़ाइनल करने के लिए कल ऑफिस जाना ज़रूरी है. सोचता हूँ आज शाम रुचिता को लेकर एस. आर. सी. हो आऊं . 'जिन ल्होर नि वेख्या.'
कल कुछ लिखा था टाइपरायटर में ४-५ पन्ने बर्बाद करके भी मन माफिक नहीं बन पाया. और न ही सर दर्द ठीक हुआ...
"मंजिल इसको तो मिलती गयी,पर इसका ठिकाना कोई नहीं.
ये जानता सबको है लेकिन, इसका पहचाना कोई नहीं,
अब इसको जो पहचान सके, ये वो अनजाना ढूंढता है, ढूंढता है...
एक अकेला इस शहर में..."

०३.०१.१९८५
आज पूरा एक महीना बीत गया भोपाल की त्रासदी को, लेकिन अभी तक अखबार के पन्ने भरे पड़े हैं, हाँ बेशक खबरें अन्दर के पन्नों में चली गयी हैं और धीरे -धीरे छोटी होती जा रही हैं. लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि हिरोशिमा-नागासाकी कि मानिंद ही न केवल इसका प्रभाव दशकों तक रहेगा बल्कि वो लोग पूरी तरह से इसके दूरगामी परिणाम को नापने में अक्षम हैं. परिणाम? वो हमेशा सोच से भयावह ही होते हैं.

०६.०१.१९८५
ठण्ड बढ़ गयी है. दिल्ली में अन्य रसद की तरह ही मौसम भी आयातित है, गर्मी जयपुर की, सर्दी शिमला की.
डायरी में रविवार के लिए इतना कम स्पेस क्यूँ है? तब जबकि सबसे ज़्यादा 'क्वालिटी टाइम' रविवार को ही बीतता है. फुरसतें, तन्हाई, करने को कुछ नहीं...
अखबार में तक तो कितने ढेर सारे सप्लीमेंट आते हैं.
अगले साल जब 'रुचिता गारमेंट्स' की डायरी छपवाऊँगा तो सबसे ज़्यादा स्पेस शनिवार, रविवार और ज़िन्दगी को दूंगा.
पूरा एक पन्ना...

१४.०१ .१९८५
बीते रविवार, सपरिवार मूवी देखने जाना चाहता था पर लगता है मैं और रुचिता अब इतने बूढ़े हो गए हैं कि बच्चों को शर्म आती हो हमारे साथ. वैसे अच्छा ही हुआ बुढौती का प्रेम-प्रदर्शन और उससे होने वाली शर्म... रुचिता के शब्दों में कहूं तो...
"हाय राम ! कुछ तो आगे पीछे की सोचा करें आप...".
...............................
...............................
..............मुस्कुरा रहा हूँ.
उसके हाथों में हाथ डाल के मूवी देखना मेरी ज़िन्दगी को ईश्वर द्वारा दिए कुछ अच्छे वरदानों में से एक है.
...एनी टाइम !
सोचता हूँ कि ऑफिस और काम की वजह से मैंने उसे जितना समय देना चाहिए था नहीं दे पाया. राजेश को कभी अपने अनुभव के आधार पर वैवाहिक जीवन के सफलता-असफलता के सूत्र ज़रूर बताऊंगा. पर...
पर, वो सुने तब ना...
अ पेसेज़ टू इंडिया अच्छी मूवी है, गोलचा वैसे बहुत स्पेशियस थियेटर नहीं है, पर चूंकि रीगल में अब तक शराबी लगी थी. तो दोबारा देखने से अच्छा सोचा अंग्रेजी मूवी ही सही. वैसे रुचिता को अंग्रेजी मूवी पसंद नहीं. खुश होने का कारण यही है कि रुचिता ने मेरा हमेशा साथ दिया. यहाँ भी.
गोलचा के बाहर पान वाला गुम्चा पिछले साल हटा दिया था, पता नहीं हटा दिया था या दुकानदार गाँव चला गया ?
राजेश बोलता है "पापा फिल्टर वाली सिगरेट पिया करो ". पर मुझे तो बस पनामा चाहिए.
आते आते 'मासूम' का रिकॉर्ड उठा लाया, पार साल देखी थी. नैनीताल जाने का प्रोग्राम इसी को देख के बनाया था...
तब भी सपरिवार...
बट ऐज़ यूज्वल डेट आल्सो टर्न्ड ऐज़ प्लानिंग डिज़ास्टर.
पता नहीं जो इंसान पोर्फेशनली इतना सफल है वो पारिवारिक स्तर पर इतना नाकामयाब क्यूँ? शायद दोनों का कारण एक ही हो या दोनों एक दूसरे के कारण...
"तुझसे नाराज़ नहीं" मेल वर्जन कम्प्रेटिवली ज़्यादा अच्छा लगा.
उठूँ अब...
सोमवार इसलिए ही अच्छा नहीं लगता.बट... यू गोट्टा डू वट यू गोट्टा डू !एंड आई ऍम डूइंग इट सिंस...
...डोंट ईवन रिमेम्बर सिंस व्हेन ?

०७.०३.१९८५
होली के दिन बस इतना अंतर आता है कि सुबह से ही शुरू हो जाता हूँ, रंग-अबीर-गुलाल से तो एलर्जी सी है. इसलिए रुचिता ही हर आने जाने वालों से मिल लेती है.
"तुम्हें तो बिल्कुल भी चिता नहीं. असामाजिक प्राणी !! हुंह..." सुबह से तीसरी या चौथी बार चाय बनाते बनाते चिल्लाती है.
काम वाली होली के दिन आये ये एक्स्पेक्ट करना भी बेईमानी होगी. शीला, घर में नहीं है. होती भी तो माँ का हाथ तो क्या ही बटाती?...
...उसे अपने को लड़का समझने और परिणामतः वैसा ही व्यवहार करने का फितूर है.
"पोप्स यू टेल मी व्हय ओनली बोयज़ शुल्ड हव दी फन? आंट दी गर्ल्स ह्यूमन बींग एज वैल?"


१०.०३.१९८५
गाईड की वी सी पी लेकर आया हूँ. जब पहली बार देखी थी तब भी अंत ने बहुत प्रभावित किया. इतनी रूमानी सी मूवी का इतना दार्शनिक अन्त? रोज़ी (वहीदा) की सेक्सुअल डिजायर को बिना मूवी को अश्लील बनाये दिखाने में विजय आनंद पूर्णतया सफल रहे हैं. बेशक इसका उपन्यास नहीं पढ़ पाया आज तक, पर मेरी 'टू डू' लिस्ट में हमेशा से ही है. मि. मल्होत्रा कहते है,
"यू मस्ट रीड इट. इट'स अ जेनुइन इंडियन क्लासिक. मूवी में वो बात कहाँ?".

१५.०३.१९८५
राजेश की चिंता लगी रहती है. मेरे मेनेजर ने बताया की नशा उन्मूलन केंद्र इतने सफल नहीं हो पाते. तब तो और भी जबकी आदमी खुद दृढ संकल्प ना हो जाये. और फ़िर ड्रग्स के राक्षस ने तो कितने अच्छे अच्छे खाते पीते घर लील लिए.


०१.०४.१९८५
दी गाडफादर पहले ही पढ़ चुका था आज द सिसिलियन उठा लाया. १०-१२ पन्ने पढने के बाद आगे पढने का मन नहीं हुआ.
राजेश के कमरे से रिकॉर्ड की आवाज़ आ रही है, पर्पल रेन का गाना होंट करता है, व्हेन डव्ज़ क्राय...
"तुम मुझे ऐसे अकेले कैसे छोड़ सकती हो,
तब जबकि ये दुनियाँ इतनी निस्सार है?
शायद मैं तुमसे कुछ ज़्यादा ही आशाएं रखता हूँ,
शायद मैं अपने पिताजी की तरह ही कुछ ज़्यादा ही धृष्ट हूँ,
और शायद तुम मेरी माँ की तरह,
...हमेशा असंतुष्ट."
क्या राजेश भी मेरी तरह ही धृष्ट.....

०२.०४.१९८५
आज फिर टी. वी. देखते वक्त रुचिता के रोने की बहुत मज़ाक बनाई गयी. कई बार तो वो सब्जी जल गई कहकर रसोई में भाग जाती है.
राजेश बोलता है, "आज फिर सब्जी में नमक और पानी डालने की ज़रूरत नहीं है. रि-साईक्लिंग यू सी."
शीला ठहाका लगा के राजेश की बात में हामी भारती है...
"ममा इज वैरी इक्नोमिकल ओन देट पार्ट."
"एंड वैरी इमोशनल ओन रेस्ट."-राजेश
बेशक मैं भी शीला और राजेश की तरह ही 'हम लोग' के परिवार को अपने और अपने परिवार से रिलेट नहीं कर पाता पर इससे प्रभावित नहीं हूँ ये कहना बेईमानी होगी. लगता है कि मध्यम और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों कि ज़्यादातर दिक्कतें आर्थिक ही हैं, पैसों को लेकर. मैंने शायद इसका हर एपिसोड देखा है और लुत्फ़ उठाया है. पता चला है कि दूरदर्शन इसे १ साल से भी  आगे बढ़ाने के मूड में है.
इट'स ऑल बाउट डिमांड एंड सप्लाई.

१२.०४.१९८५
पहली बार डायरी लिख रहा हूँ इसलिए नहीं जानता कि क्या लिखना चाहिए क्या नहीं. फ़िर भी ये एक ओब्सेशन सा बनता जा रहा है.सोच रहा हूँ जब डायरी इतनी निजी सम्पदा है तो इसको लिखा ही क्यूँ जाता है?
शायद अपने पढने के लिए...
...कभी बाद में.
हो सकता है हिसाब किताब रखने के लिए या कोई चीज़ याद रखने के लिए. पर मुझे याद नहीं आता की मैंने कभी इसमें कोई 'ऑफिशियल' या 'रिमाइन्डर' जैसी कोई चीज़ लिखी हो. ठीक ही तो है...
...निजी सम्पदा... आफ्टर ऑल !!

२०.०४.१९८५
अखबार की एक  खबर को पढ़ कर बचपन का किस्सा याद आता है, धुंधला सा...
कक्षा ६-७ की बात होगी, इतना बड़ा नहीं था कि 'प्रेम-अनुभूति' को समझ सकूँ, पर इतना बड़ा तो हो ही गया था कि किसी लड़की के साथ बात करना, बैठना सिलेबस डिस्कस करना और ढेर सारा समय बिताना बहुत भाता था.
तीन लड़कियों में सबसे बड़ी लड़की...
गीतिका... या गीतू...
सोचता हूँ कि तब थोड़ा बड़ा होता तो क्या कहता उसे? गीत... शायद !!

गीतू के पिताजी को ३ बच्चे पैदा करने के बाद संन्यास की याद आई. जब उसके घर गया २ महीने बाद तो उसकी  माँ ने बताया कि गीतिका को आगे पढाना मुश्किल होगा...
ऐसी कौन सी महाखोज थी जिसकी कीमत घर को त्याग के चुकानी पड़ी? कौन सा महाप्रकाश पाने के लिए ३ बच्चों की ज़िन्दगी में अँधेरा कर दिया? क्या ख्याल आया होगा बच्चों को सोते छोड़ घर से रात को चुपके से जाते वक्त? ये सब बातें मैं तब नहीं सोच पाया था. बस इतना जानता  था कि अब गीतू मेरे साथ स्कूल में नहीं होगी. उसके साथ के लिए मैंने उसकी माँ से उसकी फीस देने की बात कब और कैसे की ये भी याद नहीं.
मेरी जेबखर्ची बहुत थी उसके लिए.
मेरी इस कोशिश के बावजूद गीतू मेरे साथ बस एक साल ही स्कूल में रही.  
अब सोचता हूँ उसके बाप के बारे में...

पहला प्यार भूला नहीं जाता, पहली नफरत भूलनी नहीं चाहिए.

२३.०४.१९८५
सोचता हूँ बूढ़ा हो रहा हूँ तेज़ी से, पर राजेश को आवारागर्दी से फुर्सत मिले तो न वो फेक्ट्री का काम समझे. कल वो तीसरी बार 'सैसेशन सेंटर' से भाग आया. लगता नहीं कि उसकी आदत ज़ल्द ही सुधरने वाली है.
गर्मियां बढ़ गयी हैं, असहनीय...
आज शाम को ऑफिस से आने के बाद रुचिता के साथ टहलने निकल गया था...
और आज ही पता चला कि इस शहर में खासकर दिलशाद गार्डन में ढेर सारे बूढ़े और उससे भी ज़्यादा पालतू कुत्ते हैं,
दिलशाद गार्डन शायद दिल्ली के उन चुनिन्दा पॉश इलाकों में से एक है जहाँ पे अल्सिसियन या पोमिरियन नैतिकता गले में पट्टा डाले शाम ढले ए.सी. की हवा से बाहर निकलती है.शायद मल विसर्जन करने को या दूसरी नैतिकताओं का पिछवाड़ा सूंघ के उनकी जेनुइन होने की पुष्टि करने. इन नैतिकताओं का अपनी जमीन (जो कि महज़ इनकी चारदीवारी तक सीमित है) के अलावा पूरी दुनिया के बारे में 'कोऊ नृप होऊ' की भावना है और 'टांग उठाने' तक का सम्बन्ध है. ये नैतिकताएं कभी कभी अपने मालिक को भी दूर तक दौड़ा देती हैं. अगर नैतिकताओं का मालिक 'विचार', बूढा, बीमार या दोनों हों तो इसकी सम्भावना अधिक है. और अपने घर पहुँच के यही नैतिकताएं उन बूढ़े मालिकों से मार खा के 'कूँ कूँ' करके सो जाती हैं.

२४.०४.१९८५
कल शीला बड़ी देर से घर आई.
मैं तो उससे कुछ कहता नहीं, हक़ ही खो दिया शायद, पर रुचिता का कहना भी बेकार ही गया मानो. या तो बच्चे डांट से सुधर जाते हैं (शायद). या और धृष्ट (ज़्यादातर).
पर राजेश को जाने क्या होता जा रहा है, उसे तो कभी डांठा भी नहीं ?
लगता है कि कहीं कुछ छूटता जा रहा है....
मन निर्वात की ओर बढ़ रहा है. और रफ़्तार बहुत तेज़ है...
कुछ बुरे की आशंका हमेशा ही रहती है. हमेशा...

१६.०६.१९८५
पता नहीं क्यूँ मेरा फेवरेट संडे-आउटिंग-आईडिया 'मूवीज' और 'पब' से हटकर 'थिएटर' होता जा रहा है?
...शायद उम्र का तकाजा है.
नाट्य-मंचन के बाद दर्शकों और निर्देशक के इजलास से पता चला कि 'पैर तले कि ज़मीन' मोहन राकेश के मरणोपरांत उनके मित्र कमलेश्वर द्वारा पूर्ण किया गया था.
सोचता हूँ अगर मोहन राकेश ने खुद इसका अंत लिखा होता तो वो क्या होता...
...शायद इसी लिए हम 'पैर तले की ज़मीन' के मानिंद न ज़िन्दगी को अपने मायने दे पाते हैं न औरों को उनकी के, देने देते हैं. सबसे बड़ा हस्तक्षेप यही तो है...
...और फ़िर जो न हुआ हो उसे सोचना अच्छा तो लगता ही है. क्यूंकि वो, लगता है कि, हमारे बस में था. बस वही तो हमारे बस में था जो नहीं हुआ...
बहरहाल पैर तले की ज़मीन एक विपदा (बाढ़) से उपजे मनोविज्ञान की कहानी है. और मैं खुद को, अभी, इन बातों को समझने के लिए बहुत इम-मच्योर मानता हूँ (५५ साल और इम-मच्योर !!) .अगले हफ्ते विजय तेंदुलकर आ रहे हैं 'सखाराम बाइंडर' और 'खामोश, अदालत जारी है' दोनों का ही मंचन एन. एस. डी. में होना है. और यहाँ पर 'अ सोलज़र'स प्ले'.
वैसे अपने अनुभव, जो कि बहुत कम है, के आधार पर कह सकता हूँ कि श्री राम सेंटर के बनिस्पत एन. एस. डी. ज़्यादा डिवोटेड लगता है इसलिए वहां ज़्यादा मज़ा आता है. एंड बिसाइड डेट, वहाँ की दर्शक दीर्घा भी अच्छी खासी स्पेशियस है.

१७ .०६.१९८५
आज कुछ लिखने का मन हुआ, कविता सा कुछ, या कोई विचार...
देर से डायरी पड़ी हुई है, डेस्क में, मुंह चिढाती हुई..
योगक्षेमं वहाम्यहम यानी आपका लाभ और सुरक्षा मैं सुनिश्चित करता हूँ...
सच ! उम्र के इस दौर में सोचता हूँ, क्या मैं बच्चों और रुचिता के लिए लाभ और सुरक्षा सुनिश्चित कर पाया ? और क्या यही दो चीज़ें आवश्यक हैं बस ?
योगक्षेमं वहाम्यहम !
नहीं... नहीं...
ये वास्तव में किसी वित्तीय संस्था की ही टैग लाइन हो सकती है...

२५.०६.१९८५
कल बी बी सी से सुना की ३२९ में से कोई भी नहीं बचा, सोचता हूँ, ३१००० फीट की ऊंचाई में मरना कैसा लगता होगा, और विस्फोट से मरना? क्या विस्फोट के बाद भी उन लोगों की सासें चलती रही होंगी? शायद कुछ देर तक? दर्द भरी सासें. सासें कहो या सिसकियाँ कहो? भगवान उन सबकी आत्मा को शांति दे. शायद ठीक उसके बाद नरेटा एअरपोर्ट में भी ऐसा ही कोई हादसा हुआ है.
न जाने कब ये वैश्विक आतंकवाद समाप्त होगा? शायद ज़ल्दी ही....
...आमीन !
खैर, मरने वालों में अपना कोई नहीं था.


२५.०७.१९८५
नेशनल ज्योग्राफिक का लेटेस्ट एडिशन हाथ लगा है, मुख पृष्ठ में छपी 'शरबत गुला' की तस्वीर पूरे संसार में धूम मचा रही है. शरबत गुला एक अफगानी लड़की है जो अफगानिस्तान में हुए गृह युद्ध में अनाथ हो गयी थी. ये गृह युद्ध सोवियत संघ द्वारा पोषित है. अमेरिका की सहायता से शरबत गुला को ढूँढने में सफलता हाथ लगी. लगता है अमेरिका की सहायता से ही कभी अफगानिस्तान में चैन - ओ - अमन कायम होगा.बढ़िया बात है कि अमेरिका की वजह से ही, धीरे धीरे ही सही अफगानिस्तान के हालात उत्तरोतर सुधर रहे हैं.


२७.०७.१९८५.
बेक टू दी फ्यूचर...
वैसे था ये मज़बूरी का सौदा ही. रुचिता नाराज़ है वो कहती थी कि 'राम तेरी गंगा मैली' के टिकट अडवांस में ही खरीद लेने थे. रुचिता तो आधी मूवी में ही सो गयी थी, फिर घर आकर उसे पूरी कहानी सुनाई. किसी बोरिंग रिवीजन की तरह.

और मज़े की बात कहानी सुनते सुनते उसे फिर नींद आ गयी है, मैं टेबल लेम्प जला के डायरी लिख रहा हूँ, नींद नहीं आ रही, पर सोने की कोशिश करता हूँ...
कितना क्रिएटिव नाम है...
...बेक टू दी फ्यूचर !

१८.०८.१९८५
शीला फिर देर से घर आई है, उसके कमरे से उसकी और उसकी माँ की चिल्लाने की आवाज़ें आ रही हैं...
"...इफ यूअर एंड पापा'ज़ ओनली मोटो बिहाएंड सेक्स वज़ प्लेज़र, देन व्हय डिड यू गेव बर्थ टू अस? आए ऍम प्रिटी मच श्योर डेट कंडोम्स एंड अदर रिसोर्सेस वर रेडिली अवेलेबल एट योर टाइम एज वेल.
दे वर ! राईट? देन व्हाय वी ममा? व्हाय वी? क्यूँ ममा क्यूँ?"
आवाजें बंद हो गयी. डायरी भी बंद करके रख देता हूँ , शायद रुचिता इधर ही आ रही है.



२०.०९.१९८५ 
भागते फिरते,
शहरी सभ्यता से.
गंवार खेतों से होते हुए...
...गुलमोहर के झुरमटों में,
किसी पहाड़ी पे चढ़ते चढ़ते,
साथ साथ गहरे होते गड्डों से डरते...
अपनी ही आवाज़ की गूँज सुनके...
खिलखिलाते !


किसी तह किये कागज़ की सिलवटों में पड़े,
छत के किसी कोने में ...
...उंघते पीपल जैसे.
कुछ उड़ती धूल की नींव में रखे गये...
कभी ,
'गृहों की मनोदशा' की भेंट चढ़े.

या,
किसी शिलालेख के पत्थर जा हुए ...
...
...
बिखरते रहे....
...कागजों से उतरकर,
..ये सपने.


२०.१०.१९८५.
कितनी अजीब बात है कि आज फ़िर रविवार है लिखने को बहुत कुछ...
और स्पेस?
ये नहीं कहूँगा कि मुझे इस बात का अंदेशा ही नहीं था, पर जिस तरह से मैंने सोचा था वो थोड़ी मोडरेट... थोड़ी कम चुभन वाला था.
परिणाम? वो हमेशा सोच से भयावह ही होते हैं.
मुझे अब भी यकीन नहीं होता कि ऐसा मेरे साथ हुआ. और उससे ज़्यादा इस यकीन उस बात पे नहीं हो रहा जो मैं करने जा रहा हूँ....
...एक ओर अपने भविष्य (?) को लेकर उठाये कदम को पूर्णतया गुप्त रखना चाहता हूँ, दूसरी ओर ये डायरी लिख रहा हूँ, जिसको कभी न कभी किसी न किसी के द्वारा पढ़ा ही जाना है, इसको अपने साथ ले जान अपने साथ बेईमानी होगी और इसे नष्ट कर देना मेरे लास्ट ओबसेशन की हत्या.
एक, मुझे याद नहीं आता कि मैंने कब अपने होश-ओ-हवास या नशे-पत्ते में भी राजेश पर हाथ उठाया ?
दूसरा, मुझे ऐसा कोई घर भी नहीं जान पड़ता जहाँ बेटे ने अपने बाप को...
शायद ये दो बातें संयोगवश एक साथ लिख दी गयी हैं इसलिए इनके सम्बन्ध पर अब गौर कर पा रहा हूँ....
इसीलिए शायद मैं, जब इस घटना को अपने पूर्व के कार्यों से जोड़ के देखता हूँ, और उसके बाद के परिणाम, तो सच कहूँ,तो राजेश के किये पर नहीं... अपने न किये पर घृणा होती है.
चोट तो कल रुचिता को भी लगी थी, बातों की...
तब शायद रुचिता ने बात बढाई होती तो...
तो शीला भी उसके साथ...
...मुझे मालूम है,रुचिता आज भी नहीं सोयी होगी.वो इतनी मजबूत नहीं है कि इस सब को बार बार सह सके.उसका कहना अच्छा एक्सक्यूज़ था बहलाने को...
"नशे में हो जाता है. बच्चे अब बड़े हो रहे हैं. उन्हें उनका स्पेस दो.वैसे आपने भी तो इस उम्र तक कोई एब नहीं छोड़ा था."
"हाँ पर बाप को थप्पड़?"
ऐसा कुछ तीसरी बार न हो इसके लिए मुझे ही कुछ करना होगा...
..पहले शायद वक्त रहते में बहुत कुछ कर सकता था, पर अब विकल्प कम हैं, या शायद एक ही विकल्प है...
मुझे ही सुनिश्चित करना होगा...
...योगक्षेमं वहाम्यहम !

दायें पन्ने में बड़ा सा क्रॉस किया हुआ है.निशान कई बाद के पन्नों में भी है.शायद आज तक के पन्नों में.

8 टिप्‍पणियां:

  1. इतनी सशक्त कृति की सबसे बड़ी खासियत है..कि इसका श्रेय रचनाकार को देने का मन नही करता है..शिल्प इतना साधा गया है कि शक होता है कि सच मे डायरी किसी आर्काइव से, किसी कबाड़ी की दुकान से ही मारी तो नही गयी है?..डायरी के एक-एक पन्ने पर मिस्टर द्विवेदी के व्यक्तित्व की छाप है..चीजें इतनी सजीव हैं कि डायरी लेखक के व्यक्तित्व के तमाम पहलू खुद--ब-खुद गिरहें खोल कर सामने आते हैं..और लगता है कि डायरी पढ़ते हुए हम उसे उसकी पत्नी और बच्चों से भी ज्यादा जानने लगते हैं...
    ..डायरी के बहाने जैसे घड़ी पच्चीस साल पीछे खिसक जाती है..एक पूरा समय शक्ल लेने लगता है..वीसीपी, कनिष्क विमान, हम लोग, पैसेज टु इंडिया, विजय तेंदुलकर जैसे तमाम सबूत हमें अपनी आँखों को मसलने पर विवश करते हैं..तमाम सूक्ष्म डिटेल्स इस रचना के पीछे की कड़ी मेहनत और रिसर्च की गवाही देते हैं..
    ..द्विवेदी के व्यक्तित्व का यही अबुझ पहलू भी सामने आता है..कि जो इंसान तीन घंटों मे गाइड की वहीदा के अंतर्मन को समझ पाता है..वह इतने सालों मे अपनी बेटी, बेटे के अंदर झाँक के क्यों नही देख पाता है..जितना मुखर वह डायरी के पन्नों पे हो जाता है..उतना रुचिका के सामने क्यों नहीं..मगर हमारी जिंदगी इन्ही अबुझ रेशों से मिल कर बनी होती है..
    इतनी बेहतरीन कृति को एक बार पढ़ कर समझना मुश्किल है..
    बधाई!!!

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  2. और वर्ड वेरिफ़िकेशन हटा दें..

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  3. पूरा पढ़ने के बाद फिर दोबारा पढ़ा. पहली बार में बस यूँ ही पढ़ रहे थे जैसे किसी की डायरी सरसरी निगाह से पढ़ रहे हों. फिर बाद में अपूर्व का कमेन्ट देख कर लगा की यह तो कलम द्वारा गढ़ा हुआ शब्द शिल्प है. निशब्द हूँ लेखक के इस मजे हुए लेखन पर

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  4. अपूर्व के कहने के बावजूद वर्ड वेरिफिकेशन अभी तक है.. :(

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  5. पोस्ट पहले भ पढ़ी थी...आज शायद चौथी या पांचवी बार पढ़ रही हूँ. किरदार बहुत बारीकी से बुना है. डायरी एक पुराने समय की खिड़की जैसी लगती है जिससे झांक कर उस समय की कई सारी महत्वपूर्ण घटनाएं देख पाती हूँ.
    कहानी कमाल की बुनी है डायरी के पन्नों पर.

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  6. क्या कमाल लिखते हो दा आप..! गज़ब....
    speechless....

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