गुरुवार, 27 अक्तूबर 2011

गेट कन्फ्यूज्ड टू गेट रिड ऑफ़ इट.




Confused Man By :Arianne Lequay


हर एहसास, हर सोच, इतनी तात्कालिक/क्षणिक हैं कि उनके आगे (पीछे और उनसे अलग) हो जाना निश्चित ही नहीं तीव्र भी है.
...खुद इन एहसासों से भी.
किन्तु इस तात्कालिकता में 'अनिश्चितता' अथवा 'शंका' कहीं नहीं है.
ये अच्छा है या बुरा इसका विश्लेषण नहीं करना  चाहता, लेकिन परस्पर विरोधी एहसास, सोच, विचार भी अपने-अपने सोचे जाने के समय में अपने प्योरेस्ट फॉर्म में होते हैं.
यानी जब कोई विचार होते/आते हैं तो उनके विषय में 'अंतरद्वन्द' नहीं होता, और यदि किंचित भी हुआ तो एहसास परिवर्तित हो जाते हैं और अपने नए रूप में भी शुद्ध रहते हैं.
इस तरह से सोचने पर प्रत्येक 'नहीं' प्रत्येक 'शायद' एक नए विचार नई सोच को जन्म देता है. और किसी भी विचार को लेकर 'नहीं' रह ही नहीं जाता.
मन कहाँ होता है नहीं जानता पर शायद इसको ही मन से सोचना कहते हैं. मन से सोचने की स्थिति मुझे 'नैसर्गिक' स्थिति लगती है, समर्पण की, हर उस विचार को उसकी तीव्रता के समय में 'एज़-इट-इज़' स्वीकार कर लेने की स्थिति.
विरोध नहीं करते आप ! बहाव में रहते हो ! बाँध नहीं बनाते !
ये दरअसल उसी तरह है जैसे पहला आस्तिक इश्वर के विषय में बुरे/अन्यथा विचारों को अपने दिमाग/मन में आने ही नहीं देगा. ये 'नहीं आने देना' दरअसल नए विचारों की 'भ्रूण-हत्या' है, तालाब है पुराने विचारों का, कितना ही डिवाइन हो पर दुर्गन्ध युक्त.
...ये शंका है अपने विचारों के प्रति और कौनसीक्वेंटली इश्वर के प्रति.
वहीँ एक दूसरा आस्तिक, हो सकता है किसी एक क्षण में इश्वर की सत्ता को नकार ही दे, पर ये नकार देना वापसी का माध्यम होगा. उसे सदैव ज्ञात रहेगा की यदि वो विचार अस्थाई थे, तो ये भी अस्थाई होंगे.
पहली तरह से सोचने पर एक ही समय में दो विचार द्वन्द करते हैं. एक वो मेक्रो विचार जिसपर हमारी 'आस्था' है (मैं इसे इम्पोज्ड आस्था कहूँगा, वो सेल्फ इम्पोज्ड भी हो सकती है.) और दूसरा वो माइक्रो विचार जो उसका विरोध कर रही है. पर दूसरी तरह से सोचने पर दो विचार आ ही नहीं सकते. और किसी निश्चित समय में, या एक निश्चित समय-अंतराल में एक और केवल एक विचार पर अटूट आस्था होती है.
विचार ख़त्म, आस्था ख़त्म...
या
...आस्था ख़त्म विचार ख़त्म.
गिव मी सेकंड थॉट नाऊ !
मेरे अनुसार विचारों में स्थायित्व ना होना पूर्ण स्थायित्व का ही प्रथम सोपान है. जिस चीज़ और जिस विचार को आप पूर्व में सोच के नकार चुके हो उसके पुनः आने का कोई प्रश्न ही नहीं, आप उससे आगे बढ़ चुके हो दरअसल या उससे अलग हो चुके हो कम से कम. और यदि वो बिसरा विचार पुनः आता है भी तो या तो वो आता है उसपे हंस सकने के लिए या वो आता है अपने नए आयामों नए प्रश्नों के साथ.
जैसे आप वैकल्पिक प्रश्न में निश्चित हैं कि बाकी के ३ उत्तर तो ग़लत ही हैं, आपको सही उत्तर नहीं पता होने के बावजूद आपने उसका पता लगा लिया ग़लत उत्तरों का विश्लेषण करके.
टू डिनाई समथिंग रोंग, यू नीड टू अंडरस्टैंड दी रोंगनैस इनसाइड आउट.
केवल प्रेमिका के विषय में ही नहीं विचारों के विषय में भी यही सत्य है, 'लेट हर फ्री, इफ शी इज़ यौर्ज़ (शी) विल कम बैक."
दरअसल मन में प्रश्न आना एक ऑविय्स प्रोसेस है, और उनके उत्तर ढूंढना एक 'आवश्यक प्रोसेस'.

किसी व्यक्ति, संस्था, विचार अथवा कॉन्सेप्ट को लेकर मेरे विरोध सदैव ही समर्थन के हेतु रहे हैं. या तो मैं नए/आपके विचारों से सहमत हो जाऊँगा, या फ़िर मेरे खुद के विचार और पुष्ट होंगे. (वैसे 'पुष्ट' होना भी एक ग़लत शब्द है, 'अगले विरोध तक पुष्ट होंगे' टू बी मोर स्पेसिफिक. )
यही एप्रोच मेरी अंतर्द्वंद को लेकर, अपने विचारों को लेकर भी रही है. इट'ज़ नॉट पोसिबल वाली नहीं लेट'स सी व्हट कम नेक्स्ट वाली. तो यदि दो अलग समय में दो अलग/परस्पर विरोधी विचारों का समर्थन करता पाऊं अपने आप को तो इसे पुराने विचारों के साथ 'बेवफाई' नहीं नए विचारों के साथ 'टूटकर प्रेम किया जाना' कहूँगा.

पुनःश्च : जो कुछ भी मैं लिख गया कल उसको पढ़ते हुए मैं मुस्कुरा सकता हूँ, पर अफ़सोस नहीं करूँगा कि मैंने ये लिखा. क्यूंकि इसे लिखे का एक्सक्यूज़ भी इसी में है.

2 टिप्‍पणियां:

  1. आप अपने प्रश्नोत्तर में तात्क्षणिक हो चुके हैं ; आप ध्यान की तीव्रता पर है ; वो अलग बात है की ध्यान भी आपको प्रकृति से पृथक ही करता है और अष्टावक्र तो इसे भी बेकार ही मानते हैं ; पर चिंतन ञान और कर्म के लिए ये अवस्था ऊंची होती है !!

    बहुत अच्छे भाई !! मस्त :)

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  2. टू डिनाई समथिंग रोंग, यू नीड टू अंडरस्टैंड दी रोंगनैस इनसाइड आउट.
    केवल प्रेमिका के विषय में ही नहीं विचारों के विषय में भी यही सत्य है, 'लेट हर फ्री, इफ शी इज़ यौर्ज़ (शी) विल कम बैक."
    दरअसल मन में प्रश्न आना एक ऑविय्स प्रोसेस है, और उनके उत्तर ढूंढना एक 'आवश्यक प्रोसेस'. (y)

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