बुधवार, 4 जनवरी 2012

पापा क्या हो पा ?

("पापा क्या हो पा"
ये वाक्यांश किसी भी भाषा में नहीं है, पर ये अपने आप गढ़ा हुआ भी नहीं. बस इतना जान लीजिये कि इसका अर्थ "पापा क्या होते हैं? बोलो तो ज़रा?" होता है. या हो सकता है. दरअसल शब्द और मौन की सत्ता से ठीक ऊपर एक सत्ता है जिसे अपने को व्यक्त करने के लिए अगर शब्दों की आवश्यकता पड़े तो...
...और ये बात मेरे पिताजी जानते हैं !)


चाहता हूँ कि उनके जूते के फीते खोल के धीरे से उनके जूते उतार दूँ, इससे ज़्यादा आसान काम और क्या हो सकता है दुनियाँ में?
यकीन कीजिये इससे ज़्यादा मुश्किल काम और कुछ हो ही नहीं सकता...
...इस वक्त !
तीन बजे उनका एम. आर. आई. टेस्ट है. लेकिन वो साढ़े ग्यारह बजे ही तैयार हो चुके हैं. दिल्ली के ट्रैफिक में उनको यकीन नहीं है. वो चारपाई में लेटे लेटे मेरा कन्फर्मेशन लैटर शायद तीसरी या चौथी बार पढ़ रहे हैं. जब आपके लाडले ने ज़्यादा कुछ अपनी ज़िन्दगी में एचिव नहीं किया हो तो आप उसकी 'कन्फर्मेशन लैटर' जैसी तुच्छ वस्तु को भी माइक्रोस्कोपिक नज़रों से देखते हैं. अपनी नज़रों में उसके सो कॉल्ड एचीवमेंट बड़े बनाने के लिए.
जब ज़्यादा कुछ ढूँढने पर भी नहीं मिला उनको तो उन्होंने मेरा चार पन्ने का 'कन्फर्मेशन लैटर' सिरहाने में रखी साईड टेबल में रख दिया. वो जूते पहने हुए पाँव चारपाई से नीचे लटकाकर सो गए हैं. ऊँघते ऊँघते. फाइनली !
चाहता हूँ छोटा बच्चा बन जाऊं.
स्साला ये शेव बनाने कि जरूरत ही ना पड़े, ना ऑफिस जाने की. एम. आर. आई. जैसे बड़े बड़े डरावने टेस्ट ही ना हों, ना सर्वाइकल स्पोंडलाईटिस जैसी सोफेसटीकैटेड बीमारियाँ.
सिम्पल यूरिन टेस्ट हो, वो भी पापा का नहीं मेरा. सिम्पल सर्दी - ज़ुकाम या लूज़ मोशन हों, वो भी पापा के नहीं मेरे.
शेव पापा बना रहे हों, मुझे होस्पिटल ले जाने के लिए. मैं दो तीन बार वोमिट-आउट कर के स्कूल से घर भेज दिया गया होऊं. और घर आते ही स्कूल ड्रेस में ही बिस्तर में लेट गया होऊं.
जूते पहने हुए...
पैरों को नीचे लटकाकर...
...या बिमारी की कोई बात ही क्यूँ हो? कोई शाम पापा ताश के पत्तों से कोई जादू दिखा रहे हों, मैं और मेरी बहन सोफे पे, बिस्तर पे या नीचे ज़मीन पर उछल उछल के मज़े ले रहे हों. क्यूंकि पापा कभी कभी मूड में होते हैं, और जब ताश हाथों में हो तो मतलब कि वो सबसे ज़्यादा मूड में हैं. हर जादू कर चुकने के बाद हम हतप्रभ होकर उन्हें देख रहे हों. हर जादू के बाद उनका वही सवाल,
"पापा क्या हो पा?"
और हमारा वही उत्तर, "भगवान."
"ये देखो चारों इक्के एक साथ आ गए."
"वाऊ"
"पापा क्या हो पा?"
"भगवान."
...या मम्मी से मार खाकर हम दोनों भाई बहन उनके ऑफिस से आने का इंतज़ार जब कर रहे हों, तो वो आते ही हमें उदास देख कर मम्मी को झूठ -मूठ डांठना शुरू कर दें. "उन्हें कैसे पता लगा आज मम्मी को डांठा जाना चाहिए?" इस बात पे हमें आश्चर्यचकित होने का मौका देने से पहले ही वो हमसे पूछ बैठें,"पापा क्या हो पा?"
हम मम्मी को माफ़ करते हुए कहें, "भगवान !"


xxx

अल्मोड़ा में कराए गए इलाजों से संतुष्ट ना होकर उन्हें दिल्ली ले आया हूँ. दिल्ली से अल्मोड़ा के भी पूरे रास्ते भर हमारी इतनी बात नहीं हुई जितनी दो अनजान लोगों की हो सकती थी उन परिस्थितियों में.
हम दोनों के बीच कोई अलगाव फिलवक्त तो नहीं है, कोई ऐसी बात या मुद्दा भी नहीं जिस पर हम खुलकर बात ना कर सकें या कभी की ना हो. हम एक दूसरे से कुछ एक्सपेक्ट भी नहीं करते.
पता नहीं ये सब कुछ जान लेने का मौन है एक दूसरे के विषय में, या ना जान सकने का, या ना जानने का. मानो हम वो सब कुछ कहना ही ना चाहते हों, जो बातें अन्यथा संजोकर रखी जा सकती हैं. बिना कहे.
अनजान लोग सफ़र की परेशानियों के विषय में बात कर सकते हैं. या बदलते मौसम के, पर हम दोनों ने सफ़र और मौसम में से कुछ भी नहीं चुना. क्यूंकि दो लोग एक ही समय में झूठा बर्ताव नहीं कर सकते, ये जानते हुए कि दोनों को एक दूसरे का झूठ पता है.
मौन एक सच्चाई है, और दोनों ही उसे तोड़ने का प्रयास नहीं करते, बस किसी स्टॉप में रुके तो एक दूसरे की खाने की चिंता, और अपने सामान की चिंता भी एक दूसरे से नज़र बचाकर कनखियों से गोया,"हो गया फ़िर तू नहीं खायेगा पकोड़ीयाँ तो मैंने खाकर क्या करना. तेरी माँ ने आलू-पुड़ियाँ बाँधी ही हैं."
मेरे होते हुए मम्मी कभी उनकी पत्नी नहीं रही. हमेशा मेरी माँ बनी रहीं. उनकी पत्नी और मेरी माँ के बीच में मेरी रेखा थी, और जब भी वो 'तेरी माँ' कहकर पुकारते हैं तो रिश्ते से अपने को अलग हटा रहे हों माना. हम पकोड़ीयाँ खाते हुए भी उतने ही मौन थे जितना पुड़ियाँ खाते हुए होते.
बात करने के लिए किसी विषय की ज़रूरत नहीं पड़ती. और इच्छा से लिया हुए मौन को कोई भी विषय मुश्किल से तोड़ सकता है.
पहले नहीं पर आजकल डर लगता है कि धीरे धीरे दूरियाँ आयीं है. सामने से देखने में ये दूरियाँ अच्छी लगती हैं कि कम से कम हम झगड़ते नहीं, वो मुझे नहीं डांटते, पर जब ताश खेलते हुए या दुकानदार से लड़ते हुए हमारे बीच सामंजस्य का अभाव दिखता है, ये दूरियाँ मुखरित हो जाती है. 'सीप' का खेल हम जीत भी जाएं मिलकर तो भी हम जीत अलग अलग इंजॉय करते हैं.
...मिलकर करना चाहते हैं, पर करते अलग अलग हैं.

चिंता दोनों को एक दूसरे की  है, गर्व(अकारण) दोनों को एक दूसरे पर है, एक दूसरे का कहा (जो कभी-कभी ही होता है आजकल) हमारे लिए पत्थर की लकीर भी है.
पहले उनका कहा भी उनका आदेश सरीखा होता था, फ़िर उनका आदेश भी बस कहा सरीखा रह गया था, अब दोनों ही नहीं हैं. उनके कहने का मैं कोई भी मायने निकाल सकता हूँ और इसके लिए मैं उनकी ओर से स्वतंत्रत हूँ.
यही बात अच्छी लगती है शुरुआत में पर है सबसे बुरी. क्यूंकि जब तक अगले को पता नहीं है कि आप उसकी बातों का अर्थ अपने हिसाब से निकाल रहे हो (जबकि आप हमेशा ऐसा करते हो) तब तक ठीक है. लेकिन एक दिन कहने वाला जान लेता है कि बातें वो नहीं है जो उसने कही बल्कि वो हैं जो दूसरे ने सुनी. तब एक वाक्य आखिर में और जुड़ जाता है, "बाकी तेरी मर्ज़ी."

पिताजी से रिश्ता भावनात्मक कम होता है.
कम से कम मेरे मामले में तो ऐसा ही है. और मैं उसे खींच के उस स्तर लाना भी नहीं चाहता...
जैसा माँ के केस मैं है, माँ के केस में आप आँख मूँद के काम करते हो, क्यूंकि उन्होंने आपको ऐसा सिखाया है, क्यूंकि उन्होंने आपके साथ ऐसा किया है, पिताजी से आप प्रश्न करते हो, कारण उसका भी समान है.
अगर कोई आपसे कहे कि इस उंचाई से कूद जा और आप कूद जाते हैं तो यकीन करिए वो आपके पिता या माता ही हो सकते हैं.
माता इसलिए कि आप उनके लिए कुछ भी कर सकते हैं,
और पिताजी ?
इसलिए नहीं कि आप उनके लिए अपनी जान दे सकते हैं...
...अपितु इसलिए कि आप निश्चित हैं कि उन्होंने कहा होगा तो निश्चित ही इसमें आपका कोई हित निहित होगा.

...नहीं तो क्या था मौन तो मौसम और सफ़र कि बात करके भी तोड़ा जा सकता है !


क्सक्सक्स


अपनी प्रेमिका को प्रथम बार आई लव यू कहने में कितना वक्त लगता है और वो 'दौर' कितना कठिन होता होगा, मुझे इसका एक्सपीरिएंस नहीं है. क्यूंकि मेरी पूर्व प्रेमिकाओं ने इसका मौका ही नहीं दिय कभी. वो खुद ही आई लव यू कहकर चलती बनीं और फ़िर चलती बनीं.
मुझे करना बस इतना है कि उनके जूते के फीते खोलने हैं और कहना है "पापा आराम से सो जाइए. अभी बहुत वक्त है." आज तक कभी इतनी तीक्ष्ण इच्छा नहीं हुई ऐसा करने की.
मैं इतना ज़्यादा ऑबसेसड इतना ज़्यादा कंसर्नड हो गया हूँ इस चीज़ को लेकर अभी अभी की मानो मेरे पिछले सारे पापों का प्रायश्चित है 'सफलतापूर्वक' उनके जूते के फीते खोलना.


मुझे दरअसल शेव बनामे में काफी समय लगता है, मुझे आज भी याद है, (और ये याद करते हुए गालों में कहीं कुछ नहीं छिलता, मेक थ्री से शेव बनाने का यही फ़ायदा है की कितना ही बेतकल्लुफ होकर शेव बना लो, छिलता कहीं और है, अंतस में कहीं.)
उनका कहना "तेरा बाप अभी मरा नहीं. तू क्यूँ चिंता करता है?"
उस वक्त भी मुझे अपने घर से भाग जाने पर और हरिद्वार के किसी फ़ोन बूथ से उन्हें फ़ोन करने पर गर्व ही हुआ था अपने ऊपर कि देखो, मैं कैसे परेशान कर सकता हूँ इन्हें.
बड़ी देर में जाना कि ये सबसे आसान काम है. अपनों को परेशान करना, बस आप खुद को थोड़ा कष्ट पहुंचा दो वो परेशान.
"तेरा बाप अभी मरा नहीं. तू क्यूँ चिंता करता है?"
क्यूंकि जब तक उनके लाडले का बाप जिन्दा है उसे किसी भी बात की चिंता करने कि ज़रूरत नहीं सिवा जिन्दा रहने के.
"तेरा बाप अभी मरा नहीं. तू क्यूँ चिंता करता है? तेरे बाप को तुझसे कोई एक्सपेकटेशन नहीं सिवाय इसके कि तू उनसे अधिक जिये. एक दिन ही सही पर उनसे अधिक !"


xxx


"दर्शन"
पापा ने पीछे से आवाज़ लगाई,
"ज़रा जूते के फीते खोल दे यार  ! धोफरी-झूम (दोपहर की नींद) जैसी क्या लग रही ठहरी फ़िर कहा मुझे ?"

9 टिप्‍पणियां:

  1. कहानी पढते पढते मैं कहीं अतीत में घूम आया ...


    डैडी - जेन में आगे बैठ हैं और सीट बेल्ट नहीं बाँध पा रहे.

    जवाब देंहटाएं
  2. अभी इस पोस्ट को "प्राची के पार" में ढूंढ रहा था, और यह यहाँ मिला.

    जवाब देंहटाएं
  3. पापा से संवाद .... एक बेटे के लिए ज्यादा मुश्किल होता है ...बेटियों के लिए आसान

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत ही मर्मस्पर्शी प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  5. Looking to publish Online Books, Ebook and paperback version, publish book with best
    Publish Online Book with OnlineGatha|

    जवाब देंहटाएं
  6. हिंदी ब्लॉग जगत को ,आपके ब्लॉग को और आपके पाठकों को आपकी नई पोस्ट की प्रतीक्षा है | आइये न लौट के फिर से कभी ,जब मन करे जब समय मिलते जितना मन करे जितना ही समय मिले | आपके पुराने साथी और नए नए दोस्त भी बड़े मन से बड़ी आस से इंतज़ार कर रहे हैं |

    माना की फेसबुक ,व्हाट्सप की दुनिया बहुत तेज़ और बहुत बड़ी हो गयी है तो क्या घर के एक कमरे में जाना बंद तो नहीं कर देंगे न |

    मुझे पता है आपने हमने बहुत बार ये कोशिस की है बार बार की है , तो जब बाक़ी सब कुछ नहीं छोड़ सकते तो फिर अपने इस अंतर्जालीय डायरी के पन्ने इतने सालों तक न पलटें ,ऐसा होता है क्या ,ऐसा होना चाहिए क्या |

    पोस्ट लिख नहीं सकते तो पढ़िए न ,लम्बी न सही एक फोटो ही सही फोटो न सही एक टिप्पणी ही सही | अपने लिए ,अंतरजाल पर हिंदी के लिए ,हमारे लिए ब्लॉगिंग के लिए ,लौटिए लौटिए कृपया करके लौट आइये

    जवाब देंहटाएं